अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के साथ एक समाचार वार्ता में डेविड फ्रीडमन ने कहा, "वह अभी मेज़ से हटा नहीं है, सिर्फ तब तक टल गया है जब तक हम शांति को हर संभव अवसर नहीं दे देते।" इस्राईल और संयुक्त अरब इमारात तथाकथित शांति समझौता के तहत आपसी रिश्तों को सामान्य करने पर सहमत हो गए हैं। यूएई इस्राईल के साथ इस तरह का समझौता करने वाला सिर्फ तीसरा अरब देश बन गया है। तथाकथित शांति समझौता के तहत, ज़ायोनी शासन ने फ़िलिस्तीनी भूमि पर ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से क़ब्ज़ा करने की प्रक्रिया को रोक देने का वादा किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने गुरूवार को घोषणा की है कि इस्राईल और यूएई के नेता कथित शांति समझौते पर व्हाइट हाउस में लगभग तीन सप्ताह बाद हस्ताक्षर करेंगे। इस घोषणा के कुछ घंटों बाद एक समाचार वार्ता में बोलते हुए ट्रम्प ने नेतन्याहू और यूएई के शासक शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद को "दूरदर्शिता और नेतृत्व" दिखाने वाले "शानदार" साझेदार बताया। इस्राईली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि यह एक "ऐतिहासिक दिन" है और यह अरब देशों और इस्राईल के लिए एक "नए युग" की शुरुआत करेगा। लेकिन इस बीच फ़िलिस्तीनी राष्ट्र ने इस तथाकथित शांति समझौते को दृढ़तापूर्वक खारिज कर दिया और उसे उनके आंदोलन, बैतुल मुक़द्दस और दुनिया भर के मुसलमानों के साथ "विश्वासघात" बताया।
वहीं दूसरी अब इस बात की चर्चा आरंभ हो गई है कि संयुक्त अरब इमारात के बाद अब इस्राईल के साथ संबंधों की स्थापना की लाइन में सऊदी अरब व बहरैन भी खड़े हुए हैं क्योंकि इन्होंने भी संयुक्त अरब इमारात और ज़ायोनी शासन के बीच संबंध स्थापित करने में दोनों का भरपूर साथ दिया है। ट्रम्प के अनुसार इमारात ने संबंधों पर जमी हुई बर्फ़ को तोड़ दिया है। दूसरे शब्दों में यह देश, इस्लामी जगत की पिछली एक शताब्दी की सबसे कड़वी घटना को अस्तित्व में लाने में इमारात सबसे आगे हो गया है और अब दूसरों की बारी है कि वे इस कारवां से पिछड़ न जाएं। सऊदी अरब के युवराज मुहम्मद बिन सलमान के एक निकटवर्ती अधिकारी ने इससे पहले कहा भी था कि बिन सलमान, फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास को पहले ही इस तरह के दिनों की सूचना दे चुके थे। यूएई और इस्राईली के बीच आधिकारिक रूप से आपसी संबंधों की घोषणा के बाद अब अगर ख़ुद को मुसलमानों का कथित तौर पर नेतृत्व करने वाला देश कहने वाला सऊदी अरब भी ज़ायोनी शासन को अपने गले लगाए हुए जल्द दिखाई दे जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। वैसे कई दशकों से इस बात का अनुमान लगाया जा रहा था कि सऊदी अरब और उसके पिछलग्गू अरब देश लगातार जिस तरह अमेरिका की कठपुतली बने हुए हैं और उसके इशारों पर नाच रहे हैं उससे वह दिन दूर नहीं है कि जब यह सभी देश ज़ायोनी शासन को स्वीकार कर लेंगे।कुल मिलाकर आज जब इस्लामी जगत के सभी प्रतिरोध आंदोलन अमेरिका और इस्राईल के ख़िलाफ़ एक मंच पर एकजुट हैं और लगातार ज़ायोनी शासन को अपने दृढ़ संकल्प के साथ पराजित करते आ रहे हैं, ऐसी स्थिति में कथित मुसलमान कहे जाने वाले मुस्लिम देशों के शासकों द्वारा मुसलमानों और विशेषकर बैतुल मुक़द्दस से की जाने वाली ग़द्दारी को इतिहास कभी नहीं भूलेगा। जहां तक सवाल है कि क्या संयुक्त अरब इमारात और सऊदी अरब जैसे देशों द्वारा इस्राईल से हाथ मिला लेने से प्रतिरोध की आग ठंड़ी पड़ जाएगी तो यह दुश्मनों और ग़द्दारों का वह सपना है जो कभी नहीं पूरा होने वाला है। जानकारों का मानना है कि इस्राईल के साथ यूएई के संबंध सामने आने के बाद न केवल छिपा हुआ दुश्मन सामने आ गया है बल्कि इससे प्रतिरोध संगंठनों के इरादे और मज़बूत हुए हैं। कहते हैं न कि सच परेशान हो सकता है लेकिन हार नहीं सकता।